माही

माही

माही आया  नहीॆ  अब तक  ,
पग  बढ़ाया  नहीं अब तक ।

वह क्या  जाने  ईश्क  को  ,
जख्म खाया नहीं अब तक ।

ईश्क है उसके दिल में पर,
तन जलाया नहीं अब तक ।

वह  सब   समझता  है  मुझे ,
जुबां पे लाया नही अब तक ।

समय हो  गया  निकले हुए,
क्यों आया नहीं  अब  तक ?

अपना पता मैं बताऊँ क्या ?
घर बनाया  नहीं  अब तक ।

आँखें मूंद लेते है वो ‘कुमार,
मुझे भुलाया नहीं अब तक ।

कुमार अंगराल,
युनीक ऐवीन्यु काहनुवान रोड
बटाला  143505

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