काफिलो में चलते चलते

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काफिलो में चलते चलते

काफिलो में चलते चलते
थक गया हूँ मैं
कुछ दूर तक चला
फिर रुक गया हूँ मैं

रोज़ मरहा की ज़िन्दगी में
कभी सुख में कभी दुख में
यही सोच सोच कर ही
आधा गुजर गया हूँ मैं

पत्थर के शहर में
शीशे की तरह रहता हूँ
पत्थर तो नहीं हूँ
पर अन्धर से पूरा भर गया हूँ मैं

अच्छा हूँ या बुरा हूँ
पर मतलबी नहीं
जैसा भी हूँ होश में हूँ
बेशक होश वालो से डर गया हूँ मैं

गौरव शर्मा
फगवारा
9501035293

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