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गज़ल

चेहरे देखे हज़ारों मगर दिल काले थे,
हम भी कहाँ उनके झांसे में आने वाले थे।
चलते गये चलते गये परवाह ना की कभी,
ज़मीन पर काँटे और पैरों में छाले थे।
दुख देते-देते हद करदी थी उनौने,
जाने ना वो के ग़म हमने पाले थे।
चाहते रहे वो हमसे तोहफ़े हीरों के,
हमारे घर में तो रोटी के लाले थे।
बात-बात पर हम पे उठा रहे थे उँगली,
बारी खुद की आयी तो मुँह पर ताले थे।
बाहर से दिखता था आशिआना महलों जैसा,
हम अंदर गये तो हर छत पर जाले थे।

गोगी जीरा
मोबाइल :97811-36240

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